जैविक खाद
"दीदी! ये लो, आ गई खाद, तुम्हारे बगीच्चे के लिए। जैसे तुमने सिखाया था बिल्कुल वैसे ही बनात्ती ऊँ। देक्खो थैला खोलके। तबीयत खुश हो जावेगी। अब डालो अपने पौद्धों में और दिखाओ सबको इसका कमाल।"
सरला के चेहरे पर गर्व और प्रसन्नता,दोनों स्पष्ट दिख रहे थे।
श्रीमती माथुर प्यार से मुस्कुराईं, थैला खोला फिर उसे रुपये देते हुए बोलीं," बहुत बढ़िया! कल गीता जी और श्यामा जी के लिए भी ले आना। उन्हें पांँच- पाँच किलो चाहिए।"
यह वही सरला थी जो तीन साल पहले सूखा- गीला कचरा अलग करने की बात पर तुनककर श्रीमती माथुर का काम छोड़कर चली गई थी।
-चारु शर्मा
10/6/26
No comments:
Post a Comment